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Brief History of Department:

हिन्दी तथा आधुनिक भारतीय भाषा विभाग इस विश्वविद्यालय के प्रचीन तथा अत्यन्त महत्वपूर्ण विभागों में से एक है । संख्या की दृष्टि से भी यह विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा विभाग है, सन् 1920 में लखनऊ विश्वविद्यालय की स्थापना के पश्चात जब शिक्षण - कार्य आरम्भ हुआ तो इस क्षेत्र की मुख्य भाषा हिन्दी के अध्यापन की आवश्यकता को अनुभव किया गया, फलत: सन् 1922 में ‘डिपार्टमेंट ऑफ ओरियेण्टल स्टडीज’ के अन्तर्गत सामान्य हिन्दी के अध्ययन की व्यवस्था की गई । उस समय बी.ए. बी.ए.सी. के छात्रों के लिए इस प्रश्न पत्र में उत्तीर्ण होना आवश्यक था। श्री. को. अ. सु. अय्यर इस के अध्यक्ष थे। उन्ही के संरक्षण में पं. बदरीनाथ भट्ट ने अध्यापन शुरु किया । उनके प्रथम विद्यार्थी के रूप में पं. अनूप शर्मा थे। भट्ट जी सहयोग के लिए 1930 में डॉ. दीनदयालु गुप्त की नियुक्ति हुई, लेकिन भट्ट जी के असामयिक मृत्यु के कारण अध्यापन का पूर्ण उत्तरदायित्व गुप्त जी के कंधों पर आ गया । 1938-39 से स्नातकोत्तर कक्षाएं आरम्भ हुई और डॉ. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल की नियुक्ति हुई । इस विभाग के प्रथम स्नातकोत्तर छात्र थे पं. हरिकृष्ण अवस्थी , जो कालान्तर में न सिर्फ इस विभाग के अध्यक्ष रहे बल्कि वह इस विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने।

सन् 1938 से 1946 के मध्य अनेक नामचीन लोगों ने यहाँ से बी0ए0 तथा एम0ए0 की परीक्षा उत्तीर्ण की, जिनमें डॉ. भगीरथ मिश्र, डॉ. गंगाप्रसाद मिश्र, डॉ. हीरालाल दीक्षित, डॉ. (कुँवर) चन्द्रप्रकाश सिंह, डॉ. केसरी नारायण शुक्ल, डॉ. ब्रजकिशोर मिश्र आदि उल्लेख्य है, तब तक संस्कृत विभाग से सम्बद्ध इस विभाग के पृथक अस्तित्व का विचार सामने आने लगा था ; सौभाग्य से आचार्य नरेन्द्रदेव इस विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए। प्रो0 अय्यर और डा0 गुप्त की उदार सहमति पर आचार्य नरेन्द्रदेव ने सन् 1947 में हिन्दी के स्वतन्त्र विभाग की स्थापना की।

सन् 1946 तक इस विभाग में काव्यशास्त्र, भक्तिकाव्य, रीतिकाल, आधुनिक काव्य तथा भाषा विज्ञान के विशेषज्ञ अध्यापक के रूप में क्रमशः डॉ. भगीरथ मिश्र डॉ. केसरी नारायण शुक्ल, डॉ. हरिकृष्ण अवस्थी, डॉ. जानकी नाथ सिंह ‘मनोज‘ तथा डॉ. सरयूप्रसाद अग्रवाल की नियुक्ति हो चुकी थी। सन् 1949 से स्नाकोत्तर पाठ्यक्रम में भाषाविज्ञान को भी सम्मिलित कर लिया गया। सन् 1960 में लोक साहित्य को एक प्रश्नपत्र, के रूप में स्थान दिया गया। इसी वर्ष भाषाविज्ञान का द्विवर्षीय वैकल्पिक पाठ्यक्रम एवं एम0ए0 स्पेशल के पाठ्यक्रम प्रारम्भ किए गए। 1974 में भाषाविज्ञान का पृथक विभाग बना दिया गया। इस बीच डॉ. बड़थ्वाल और डॉ. मनोज का असामयिक देहावसान हो गया।

सन् 1949 में विश्वविद्यालय का रजत जयन्ती समारोह हुआ। इसमें आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को डी0लिट0 की मानद उपाधि दी गयी। साथ ही डॉ. दीनदयाल गुप्त के प्रयास से ‘सेठ भोलाराम सक्सेरिया ग्रन्थमाला‘ के नाम से प्रकाशन का कार्य शुरू हुआ। डॉ. भगीरथ मिश्र का ‘हिन्दी काव्यशास्त्र का इतिहास‘ इस ग्रंथमाला का प्रथम प्रकाशन था।

डॉ. गुप्त के कार्यकाल में ही इस विभाग का परिविस्तार हिन्दी के साथ-साथ आधुनिक भारतीय भाषाओं में भी हो गया था। अतः बंगला और मराठी के अंशकालिक तथा तमिल के पूर्णकालिक शिक्षक की नियुक्ति हुई ।

डॉ. गुप्त के पश्चात 1968 से डॉ. केसरी नारायण शुक्ल ने हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण किया। उन्होंने विभागीय व्याख्यान माला का शुभारम्भ किया। पाठ्यक्रम को भी कुछ नया रूप देने का प्रयास किया। इस संदर्भ मे उन्होने प्रवक्ता से प्रोफेसर तक के पदों हेतु अनेक नियुक्तियाँ भी की। सन् 1976 से 1977 तक प्रो. हरिकृष्ण अवस्थी के अध्यक्षीय दायित्व के पश्चात डॉ. सरला शुक्ल 1978 ई0 ने इस विभाग की आचार्य एवं अध्यक्ष बनीं । उनके 9 वर्ष के कार्यकाल में विभाग में ‘सूर-पंचशती’ का आयोजन किया गया। सन 1987 में उनके अवकाश प्राप्त करने के पश्चात डॉ. सूर्यप्रसाद दीक्षित इस विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष बने। उनके कार्यकाल में हिन्दी विभाग का सर्वतोमुखी विकास हुआ, जिसे देखकर डा0 भगीरथ ने कहा भी कि ‘‘अब हमारा विभाग अपने स्वर्णकाल में है।‘‘

इसी समय एम0फिल0 का पाठ्यक्रम लागू हुआ और पुरानी हिन्दी (आदिकाव्य), देशान्तरी तथा हिन्दीतर राज्यों का हिन्दी साहित्य और शोध प्रविधि का विधिवत अध्ययन प्रारंभ किया गया। डॉ. दीक्षित ने लघु शोध प्रबन्ध के विषयों को अल्पख्यात रचनाकारों तथा जनपदीय साहित्य से जोड़ा। एम0ए0 में अनेक नए प्रश्नपत्र प्रारंभ किये गये जिससे यह पाठ्यक्रम परम्पराबोध, रोजगार, राष्ट्रीय भावैक्य और मूल्य बोध से जुड़ गया। भारतीय हिन्दी परिषद् ने इसे नये मॉडल के रूप में मान्यता दी। इसी समय यू0जी0सी0 की सहायता से बी0ए0 में प्रयोजनमूलक हिन्दी का त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम भी लागू हुआ।

विगत दशक में विभाग में दर्जनों राष्ट्रीय सेमिनार, कई नाट्यकृतियों के मंचन, सृजनपीठ के तत्त्वाधान में कई रचनाशिविर आयोजित किये गये। डॉ. ब्रजकिशोर मिश्र की स्मृति के में शनिवासरीय व्याख्यानमाला संचालित हुई । विभागीय पुस्तकालय को डॉ. दीनदयालु को समर्पित करते हुए उसे समृद्धि किया गया। पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल की स्मृति में शोध कक्ष की स्थापना हुई। इसके संचालन के लिए शोध समिति बनी जो प्रतिवर्ष 13 दिसंबर को डॉ. बड़थ्वाल का जन्मदिवस ‘शोध दिवस’ के रूप में मनाती है। भारतीय भाषा संगम के सहयोग से भारतीय भाषा दिवस, तुलसी जयन्ती पर अनुराग व्याख्यान माला, गिरिजा कुमार माथुर स्मृति डी0लिट0 उपाधि और पी0-एच0डी0 उपाधि के लिए 700 शोध प्रबन्ध स्वीकृत हुए ।

विभाग के कई छात्र देश-विदेश में महत्वपूर्ण पदों पर प्रतिष्ठित हुए जिनमें डॉ. केसरीनारायण शुक्ल, डॉ. भगीरथ मिश्र, डॉ. विपिनबिहारी त्रिवेदी, डॉ. त्रिलोकी नारायण दीक्षित, डॉ. प्रेमनारायण टण्डन, डॉ. हरिकृष्ण अवस्थी, डॉ. देवकीनन्दन श्रीवास्तव आदि उल्लेखनीय है।

इस बीच विभाग ने लगभग 20 नए ग्रन्थों का प्रकाशन किया। 1993 में प्रकाशन की स्वर्ण जयन्ती सम्पन्न हुई। विभाग की पूर्व प्रकाशित पत्रिका ‘ज्ञानशिखा’ का पुनरारम्भ किया गया और इसके 30 से ज्यादा विशेषांक प्रकाशित हुए। विभाग ने हिन्दी प्रयोगशाला की स्थापना भी की जिसमें पत्रकारिता विभाग के सहयोग से 15 वृत्तचित्र बनाए गए। लगभग 50 आडियो कैसेट्स तैयार किए गए। मध्ययुगीन साहित्य तथा जनपदीय अवधी साहित्य के क्षेत्र में विभाग विशेषतः चर्चित है।

प्रो0 दीक्षित के अवकाश प्राप्ति के पश्चात प्रो0 इन्दुप्रभा पाराशर ने 1998 में विभाग के अध्यक्ष का कार्यभार ग्रहण किया। प्रो0 पाराशर के कार्यकाल में विभागीय गतिविधियों को मंच तैयार किया गया। 31 अक्टूबर 1998 से 9 जून 2001 तक साहचर्य कार्यक्रम के अंतर्गत शताधिक संगोष्ठियों का आयोजन किया गया । सन् 2007 में उनके सेवानिवृत्त होने पर सन् 2008 में प्रो0 प्रेमशंकर तिवारी विभाग के अध्यक्ष नियुक्त हुए। प्रो. प्रेमशंकर तिवारी जी 2008-2011 तक अध्यक्ष पद पर रहें । इनके कार्यकाल में विभाग के कई प्राध्यापक एवं उपाचार्य नियुक्त हुए तथा प्रोफेसर पद पर प्रोन्नत हुए, विभाग में अवस्थापना का कार्य हुआ, शैक्षिक उन्नयन तथा सांस्कृतिक साहित्यिक कार्यक्रम संपन्न हुए ।

प्रो0 प्रेम शंकर तिवारी जी का अध्यक्षीय कार्यकाल पूर्ण होने पर प्रो0 कैलाश देवी सिंह ने 24 फरवरी 2011 को हिन्दी विभागाध्यक्ष का पद संभाला। प्रो0 सिंह विभाग को पुनः गतिशील करने के लिए प्रयत्नरत रहीं । आपने अपने कार्यकाल में विभाग में अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ आयोजित की । ‘रामकथा का वैश्विक परिदृष्य‘ तथा मैदानी रामलीला का वैश्विक परिदृश्य‘ पर मारीशस से पधारी इन्द्राणी रामप्रसाद का व्याख्यान कराया एवं कई जनपदीय संगोष्ठियाँ भी आयोजित कराई ।

प्रो. सिंह के कार्यकाल में उ0प्र0 सरकार ने हिन्दी विभाग को ‘उत्कृष्टता केन्द्र योजना‘ का दर्जा प्रदान करके 12,85,000/- की योजनाएं स्वीकृत की । आपके सद्प्रयास से विभाग की हिन्दी प्रयोगशाला में 7 कम्प्यूटरों की लैब क्रियाशील हुई । प्रो0 सिंह ने विभाग की विभिन्न इकाइयों-पुस्तकालय, प्रकाशन, व्याख्यान-माला, सांस्कृतिकी आदि का पुनर्गठन करके इसे क्रियाशील बनाने का उपक्रम किया। उनके कार्यकाल में 23 जे0आर0एफ0 अभ्यर्थियों का पीएच.डी. उपाधि हेतु पंजीयन हुआ । प्रो0 सिंह के कार्यकाल में 15-16 अक्टूबर 2011 को भारतीय हिन्दी परिषद् के अधिवेशन के रूप में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी जो हिन्दी का महाकुम्भ सिद्ध हुआ ।

31 मार्च 2013 को प्रो0 कालीचरण स्नेही, हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए, प्रो0 कालीचरण –‘स्नेही’ के कार्यकाल में विभाग में अनेक मासिक साहित्यिक आयोजन सम्पन्न हुए जिनमें ‘कालिदास सच-सच बतलाना‘ राष्ट्र के ख्यातिलब्ध साहित्यकारों द्वारा एकल काव्य पाठ तथा नजरिया अपना-अपना में समसामयिक वैचारिकी पर केन्द्रित कार्यक्रम उल्लेखनीय है। ऐसे दर्जनभर कार्यक्रम अलग-अलग विधाओं पर हुए जिनमें समसामयिक सामाजिक सन्दर्भ और साहित्य एवं सामाजिक आंदोलन और हिन्दी साहित्य पर अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी/राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई।

31 मार्च 2016 को प्रो0 प्रेम सुमन शर्मा ने विभागाध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण किया है । अभी तक की अल्पावधि में उन्होने विभाग में अनेक कार्यक्रमों को सम्पन्न कराया है इनमें 30 जुलाई को प्रेमचंद्र जयंती समारोह, 10 अगस्त को तुलसी जयंती समारोह, 30 अगस्त को बाबू भगवतीचरण वर्मा तथा अमृतलाल नागर जयंती समारोह, 03 सितम्बर को हिन्दी शिक्षक मिलन समारोह, 14 सितम्बर को हिन्दी भाषा दिवस एवं 10-11 दिसम्बर 2016 को एक राष्ट्रीय सामाजिक भावैक्य विषयक संगोष्ठी प्रमुख है। उनके द्वारा विभागीय शोध पत्रिका ‘ज्ञानशिखा‘ का पुनप्रकाशन आरम्भ कराया गया। उनकी संकल्पना में कई महती योजनाएँ जैसे - मास्टर क्लास रूम की स्थापना, विभागीय सभागार एवं विभागीय प्रकाशन का पुनर्जीवित करना, अनेक राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रमों का आयोजन कराना और हिन्दी विभाग को वैश्विक पटल पर स्थापित करना। विभागीय शोधार्थियों के लिए एक स्वतंत्र अध्ययन कक्ष की स्थापना भी उनकी कार्य योजनाओं के अन्तर्गत सम्मिलित है।